स्तुति का अर्थ है किसी की बड़ाई करना, प्रशंसा करना जबकि प्रार्थना करते हैं किसी से कुछ प्राप्ति के लिए। प्रार्थना है प्राप्ति के लिए विनीत भाव से निवेदन करना।
ईश्वर की स्तुति का अर्थ है कि ईश्वर के जितने भी गुण कर्म स्वभाव हैं उनकी प्रशंसा करना। उदाहरण के लिए— हे परमेश्वर तुम न्यायकारी हो, दयालु हो, आनन्दमय हो इत्यादि। प्रार्थना में ईश्वर से उसके गुणों की प्राप्ति के लिए विनय की जाती है।
ईश्वर की स्तुति और प्रार्थना साथ-साथ की जा सकती है। जैसे
- हे ईश्वर, आप न्यायकारी हो, मुझे भी न्याय करने की प्रेरणा दो। मैं भी किसी के साथ अन्याय ना करुं।
- हे ईश्वर, तुम दयालु हो मेरे में भी दया की भावना विकसित हो।
- हे ईश्वर, तुम आनंद के सागर हो, मेरा जीवन भी आनंदमय हो। इत्यादि।
कर्म और भक्ति में कोई अंतर नहीं। अच्छे कर्म करना ईश्वर की भक्ति ही है।
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