यह नास्तिकों का महावचन है कि आप दीपो भवः। इस पर विचार करेंगे कि यह वचन कितना सत्य है।
जब मनुष्य नास्तिक बन जाता है तो वह किसी के किए हुए उपकार को नहीं मानता है। वह कृतघ्न बन जाता है।
संसार को बनाकर उसमें जीवों के हितकारी नाना प्रकार की वस्तुओं को बना कर परमात्मा ने जीवात्मा का उपकार किया है। यहां तक की मानव शरीर देकर जीवात्मा के मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त किया है।
मनुष्य सहज ज्ञान के साथ संसार में आता है लेकिन आर्ष विद्या के लिए उसे गुरुजनों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह बात परंपरा से सिद्ध है कि प्रत्येक मनुष्य अपने माता, पिता और गुरु से भाषा और ज्ञान प्राप्त करता रहता है। कोई व्यक्ति कितना भी बुद्धिमान क्यों न जन्म ले अगर उसे जंगल में छोड़ दिया जाए तो वह पशुवत बन जाता है। वह पशु की तरह आचरण करता है। यहां तक की, उसे कुत्ते के बीच रख दिया जाए तो यह देखा गया है कि वह कुत्ते की तरह ही नकल करता है भौंकता है इत्यादि। रूस और भारत या अन्य कई देशों में इस बात के साक्षात प्रमाण उपलब्ध है। वीडियो देखें।
https://youtu.be/bH3NNkG0uI0?si=BhxMpe8F4XTdiWod
मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद।
—यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है।
वस्तुतः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु का अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है। बिना गुरु के ज्ञान की बात करना मूर्खता और कृतघ्नता ही है।
जिस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य अपने पूर्वजों से ज्ञान ग्रहण करता है। उसी तरह सृष्टि के आदि में मनुष्य परमात्मा से ग्रहण ग्रहण करता है।
योगशास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि ‘स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्’। शब्दार्थ :- स एष, ( वह ईश्वर ) पूर्वेषाम्, ( पहले उत्पन्न हुए सभी गुरुओं का ) अपि, ( भी ) गुरु, ( ज्ञान देने वाला / विद्या देने वाला है । ) कालेन, ( काल अर्थात समय की ) अनवच्छेदात्, ( सीमा / बाध्यता से रहित होने के कारण । )
भावार्थ :- वह परमात्मा काल की सीमाओं से परे है वही पहले उत्पन्न हुए सभी गुरुओं का भी गुरु अर्थात विद्या देने वाला है। सृष्टि के आदि में अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा और ब्रह्मादि गुरुओं का भी गुरु है।
सृष्टि के आदिकाल से गुरुशिष्य परम्परा है और सृष्टि पर्यन्त रहेगी।
जैन बौद्ध काल में नास्तिकता का प्रचार प्रसार हुआ और उन्होंने भगवान और वेद की अपौरुषेयता को नकार दिया।
यदि किसी बौद्ध से पूछा जाए कि गौतम बुद्ध के गुरु कौन थे तो वह नहीं बता सकते। वे यही कहेंगे कि आप दीपो भवः। अपना गुरु अर्थात प्रकाश स्वयं बनो। जबकि यह बात अनुभव प्रैक्टिस के विपरीत है। अगर आप बीमार पड़ते हैं तो आप अपना चिकित्सा खुद नहीं करते हैं किसी योग्य डॉक्टर के पास जाते हैं। कुछ किताबें आती है जिनका शीर्षक होता है अपना वैद्य खुद बनो। लेकिन यहां भी व्यक्ति को उस किताब को ही अपना गुरु बनाना पड़ता है। खुद कोई बौध अपने बच्चों को गुरुकुल न भेजें तो क्या बच्चा विद्वान बन सकता है?
हुआ यह होगा कि बुद्ध अपने काल में कई-कई तथाकथित साधु संतों के पास ज्ञान के लिए गए लेकिन उनसे उनको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि वे सभी योग्य साधु संत नहीं थे या फिर नकली साधु संत थे।
आज भी कहीं ऐसे नकली साधु संत है जिससे पूछा जाए कि आपके गुरु परंपरा में गुरु कौन है तो वह कहते हैं मेरे कोई गुरु नहीं हुए, मैं तो खुद ही अपने आप ही ज्ञान प्राप्त कर लिया। कोई विद्वान व्यक्ति इस तरह के लोगों को मान्य नहीं करता क्योंकि बिना गुरु के सत्य विद्या ग्रहण नहीं होता।
गीत संगीत इत्यादि विद्या तो ऐसी है जिनको गुरुमुखी विद्या कहते हैं जिसे बिना गुरु के शरण में जाए प्राप्त किया ही नहीं जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के छंद गणित इत्यादि को बिना गुरु के प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह सभी आर्ष विद्वान के शरण में जाकर ही सीखा जा सकता है।
लेकिन जब जीवात्मा परमात्मा को भूलकर अपने अहंकार में चूर हो जाता है तो वह भगवान को नहीं मानता है वह कहता है कि वह सब कुछ है खुद ही है। उसी अहंकार से निकली हुई वाणी है- आप दीपो भवः। यह अपना दीपक स्वयं बनो। नास्तिक मत की महावाणी है। चार्वाक चारु वाक से बना है जिसका अर्थ है जो वाणी सुनने में अच्छा लगे। प्रत्येक व्यक्ति का जब अहंकार पोषित होता है तो वह व्यक्ति खुश होता है। तो अहंकारियों का वचन है - आप दीपो भवः।
कोई दीपक खुद प्रकाशित नहीं होता है उसको प्रकाशित तो दीपक का स्वामी ही करता है।
© अजीत कुमार, सर्वाधिकार सुरक्षित।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें