डिस्क्लेमर:
लेख का उद्देश्य व्यक्ति के मत, पन्थ सम्प्रदाय की तथ्याधारित समालोचना करना है न कि पक्षपात कर किसी के भावनाओं को आहत करना।
मांसाहारी एवं पशुबलि करने वाले स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय
आमतौर पर लोग यह जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने शिकागो, अमेरिका में जब धर्म संसद में भाषण दिया तब उनके भाषण से प्रभावित होकर अमेरिका में उनका नाम गूंज उठा। अमेरिका की प्रसिद्ध टाइम मैगजीन ने उनका भव्य विवरण किया इत्यादि। ये बाते सत्य हैं लेकिन लेख का उद्देश्य पाश्चात्य मीडिया के आलोक में उनके व्यक्तित्व के महिमामंडन से नहीं है। स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और प्रभाव को तो उनके दिए गए भाषण, कार्य और उसके समाज पर पड़े प्रभाव से ही समझना चाहिए।
सबसे पहले यह ज्ञात होना चाहिए कि स्वामी विवेकानंद मांसाहारी थे। प्रथम बार यह सुनकर कई लोगों को आश्चर्य होता है, ऐसे इंटरनेट के क्रान्ति के पश्चात यह बात बहुत लोगो को ज्ञात भी हो चुका है। कुछ लोग कहते हैं कि विदेश प्रवास के दौरान मजबूरीवश स्वामीजी ऐसा भोजन करते थे लेकिन यह बात पूरी तरह भ्रामक है।
मनः सत्येन शुद्धयती अर्थात मन सत्य से शुद्ध होता है लेकिन मन पर पहले से पूर्वाग्रह का मल हो तो मन वही देखता व सुनता है जो वह देखना सुनना चाहता है। माँसाहारी और विवेकानंद के प्रति अंधभक्त इस बात का ध्यान रखकर ही इस लेख को पढ़ने का निर्णय करें।
ऐसा कहना कि विदेश में स्वामी विवेकानंद का मांसाहार करना मजबूरी थी, थोथी दलील, बकवास है। यह कहना कि ठन्डे मुल्क में मांसाहार अनिवार्य है, थोथी दलील है। माँसाहार का देश काल से सम्बंध नहीं। वस्तुतः मांसाहार एक संस्कार है, मानसिकता है। विदेशों में भी कई लोग शाकाहारी रहे हैं जिसमे जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।
ऐसा नहीं कि विवेकानंद को यूरोप की ठंडक और शाकाहारी भोजन के अभाव ने मांसाहारी बनने पर मजबूर किया था अपितु यह तो उनका संस्कारगत दोष था। इन्द्रीयलोलुप्तता या जीभ के स्वाद के प्रति कितनी बेचैनी थी यह उनके कंपलीट वर्क्स को पढ़ने वाले पाठक को स्वतः ही विदित हो जाएगा। रही बात यूरोप में शाकाहारी लोगों की तो उनकी भी कमी नहीं रही है। विश्व विख्यात नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शा तो विशुद्ध शाकाहारी थे। जापान में भी मांसाहार का व्यापक प्रचलन नहीं था परंतु मेइजी रीस्टोरेशन के बाद अर्थात मेईजी पुनरुत्थान के बाद पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में वहाँ मांसाहार का तीव्र प्रचार प्रसार हुआ।
यह सत्य है कि एक संन्यासी स्वामी होने के बावजूद भी विवेकानंद मांसाहारी थे। मांस मछली बचपन से बड़े चाव से खाते थे। साथ ही, सिगरेट भी बहुत पीते थे। अंग्रेजी बोलने में फर्राटेदार थे और विदेशी वस्त्र, भाषा, शिक्षा और विचार के पक्षधर थे। इस सम्बंध में अगर आप नहीं जानते और यह जानकारी नया लग रहा हो तो पूरा लेख आगे पढ़ें।
लेख का उद्देश्य केवल तथ्यों को रखना है। पाठक स्वविवेक से निर्णय करें कि एक वैदिक सनातनी संन्यासी के लिए मांसाहारी होना कितना उचित है। साथ ही विवेकानंद के जीवन और दर्शन की मीमांसा भी आगे की है। अतः शुरू से अंत तक पढ़कर विचार स्थिर करें।
अहिंसा परम् धर्म
भारतीय वैदिक सनातन परम्परा की आधारशिला ही अहिंसा है। मांसाहारी कुतो दया। मांसाहारी को दया कहां और दया बिना धर्म की कल्पना भी सम्भव नहीं।
धर्म केवल अच्छी अच्छी बात कहने के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता। धर्म एक क्रियात्मक शब्द है। इसको जीवन मे उतारने का नाम है। जो सोचे वही बोले और जो बोले सो करे। यही सक्रियात्मकता ही धर्म है, इसके विपरीत नहीं।
ऋषियों ने परमात्मा प्राप्ति के लिए अहिंसा को धर्म के प्रथम यम/संयम में गिनती की है।
अष्टांग योग के अनुसार —
तत्राऽहिंसासत्याऽस्तेयब्रह्मचर्याऽपरिग्रहा यमाः॥
— सूत्र पातञ्जल योगशास्त्र से हैं।
जो उपासना का आरम्भ करना चाहे उस के लिये यही आरम्भ है कि वह किसी से वैर न रक्खे, सर्वदा सब से प्रीति करे। सत्य बोले। मिथ्या कभी न बोले। चोरी न करे। सत्य व्यवहार करे। जितेन्द्रिय हो। लम्पट न हो और निरभिमानी हो। अभिमान कभी न करे। ये पांच प्रकार के यम मिल के उपासनायोग का प्रथम अंग है।
शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥
—योग सू॰॥
राग द्वेष छोड़ भीतर और जलादि से बाहर पवित्र रहै। धर्म से पुरुषार्थ करने से लाभ में न प्रसन्नता और हानि में न अप्रसन्नता करे। प्रसन्न होकर आलस्य छोड़ सदा पुरुषार्थ किया करे। सदा दुःख सुखों का सहन और धर्म ही का अनुष्ठान करे, अधर्म का नहीं। सर्वदा सत्य शास्त्रों को पढ़े पढ़ावे। सत्पुरुषों का संग करे और ‘ओ३म्’ इस एक परमात्मा के नाम का अर्थ विचार करे नित्यप्रति जप किया करे। अपने आत्मा को परमेश्वर की आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे। इन पांच प्रकार के नियमों को मिला के उपासना योग का दूसरा अंग कहाता है।(1)
सत्य और अहिंसा से मनुष्य निर्भय हो जाता है और उसका कोई शत्रु नहीं। धर्म के मार्ग पर चलने की यह प्रथम अनिवार्यता है।
स्वार्थी दोषम न पश्यति
जो स्वार्थीजन होते हैं वे असत्य को भी कुतर्क से सत्य बताते हैं और अपना हित साधते हैं। जो व्यक्ति मांसाहारी है, उसके लिए मांसाहार में दोष नहीं दिख सकता क्योंकि अगर मांसाहार में दोष दिखे तो कोई मांसाहारी भोजन न करे।
स्वामी विवेकानंद का मांसाहार के सम्बंध में विचित्र वदितोव्याघात है।
About vegetarian diet I have to say this - first, my Master was a vegetarian; but if he was given meat offered to the Goddess, he used to hold it up to his head. The taking of life is undoubtedly sinful; but so long as vegetable food is not made suitable to the human system through progress in chemistry, there is no other alternative but meat-eating. So long as man shall have to live a Rajasika (active) life under circumstances like the present, there is no other way except through meat-eating. (Complete works, 5.403)(2)
हिंदी में अर्थ निम्न हैं -
शाकाहारी भोजन के बारे में मुझे यह कहना है - पहला, मेरे गुरु शाकाहारी थे लेकिन अगर देवी को मांस चढ़ाया जाता था, तो वह उसे अपने सिर तक रखते थे। जीवन का लेना निस्संदेह पापपूर्ण है; लेकिन जब तक सब्जी खाना रसायन विज्ञान में प्रगति के माध्यम से मानव प्रणाली के लिए उपयुक्त नहीं है, तब तक मांस खाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। जब तक मनुष्य को वर्तमान जैसी परिस्थितियों में राजसिक (सक्रिय) जीवन जीना होगा, तब तक मांसाहार के अलावा और कोई उपाय नहीं है।
भला कोई मांस मछली खाये और अपने को शाकाहारी कहे तो यह वाग्जाल नहीं तो क्या है। इसके विपरीत शाकाहार को अवैज्ञानिक बताना और मांसाहार को विज्ञानसम्मत बताना समझ के बाहर है। रामकृष्ण परमहंस बलि चढ़ावे, मांस का प्रसाद बंटावे और विष्णु के अवतार कहलाये, अजीब वैष्णव हैं। तो सत्य क्या है?
मांसाहार एवं तन्त्रमार्ग
मांसाहार का उदगम, प्रचार प्रसार का हेतु तंत्र ग्रन्थ और तांत्रिक मत है। तंत्र शब्द से जुड़ा हुआ शब्द है तांत्रिक। तंत्र का शाब्दिक अर्थ अंग्रेजी के सिस्टम का समानार्थी है। पाचनतंत्र, श्वसनतंत्र, तंत्रिकातंत्र, पंचतंत्र, पारितन्त्र इत्यादि में तंत्र का यही अर्थ है।
अब रही बात तन्त्रमार्ग की। इस वाममार्गी विचार ने तंत्र साधना को बढ़ावा दिया। इस तंत्र मत या पन्थ के पांच मकार हैं—
- माँस
- मीन/मछली
- मदिरा/ मद्य शराब
- मैथुन अर्थात सेक्स/काम क्रीड़ा
- मुद्रा अर्थात मनी/रुपये पैसे धन दौलत
इन पञ्च तत्वों की आराधना को तंत्र ने उपासना कहा है। मुद्रा यानी मनी धन दौलत के आधार पर अन्य चार तत्वों की प्राप्ति करना तन्त्रमार्ग के उपासक के लिए नियम है। जब रुपये हो तो खाओ पियो सेक्स करो इत्यादि। यह मत संसार का सबसे गुप्तमत साधना है। आपने सुना पढा होगा कि तन्त्रमार्ग के साधक एकांत में गुप्त साधना करते हैं। अब सत्य समझें।
इस तंत्र ने संसार में सुखवादी दर्शन को बढ़ाया फैलाया। यह एक भोग/संभोग से जुड़ा हुआ कल्ट है जिसमे गुप्त रूप से इन पञ्च तत्वों की प्राप्ति के लिए झूठ सच आदि सभी प्रपंचों का सहारा लेना उचित माना गया है। झूठ गुप्तरूप में फैलता है। तांत्रिकों का मूल उद्देश्य दूसरे के धन को लूटकर ऐश भोगना ही है लेकिन कोई भी तांत्रिक प्रत्यक्ष यह नहीं बताता। कई बार अज्ञानवश लोग तंत्र मत के जालग्रन्थ को पढ़कर मानवबलि भी दे देते हैं। ऐसे लोगों को मालूम ही नहीं कि भारत मे तन्त्रमार्ग का उदय क्यों हुआ।
तन्त्रमार्ग के देवी देवता
शिव, भैरव, भूतनाथ, काली व दुर्गा जैसे वीभत्स देवी देवताओं की उपासना तांत्रिक साधना में की जाती है। साधक को किसी सद्ग्रन्थ वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन नहीं करना होता। बौद्धिकता से परे, कोरे विश्वास के आधार पर साधना करनी होती है। मांस मदिरा का सेवन, पशुबलि आदि साधना के नाम पर किए जाते हैं। कन्या या स्त्री को नग्न कर उसके योनि की पूजा होती है और गुप्त रूप से निर्जन स्थान पर कामक्रीड़ा की जाती है इत्यादि। साधक जो मांस मछली नहीं खाये उसे साधना से अलग कर दिया जाता है अथवा गुप्तरूप से मार दिया जाता है।
रामकृष्ण परमहंस
बिना रामकृष्ण परमहंस के विवेकानंद की जीवनी और दर्शन समझना सम्भव नहीं। एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में गदाधर/रामकृष्ण का जन्म हुआ। विद्या के प्रति बचपन से अरूचि थी और निर्धनता जन्मजात थी। फलस्वरूप जीविकोपार्जन के लिए मन्दिर के पुजारी बन गये क्योंकि ब्राहमण कुल के यह सरल जीविकोपार्जन है। बाल विवाह कन्या शारदा से हुआ जिसे बाद में अपनी पत्नी व माता के रूप में प्रचारित किया क्योंकि यह तन्त्रमार्ग के अनुरूप है।
भला पत्नी को माता कहना कैसे उचित हो सकता है। कल कोई पुत्र अपनी माता को पत्नी कहे तो क्या उचित होगा। गृहस्थ आश्रम के नियमों के विपरीत जाना भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। प्रत्येक रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व है और पवित्र रिश्ते को तोडा या परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। पारिवारिक रिश्ते का अपना महत्त्व है जैसे सामाजिक रिश्ते का। जैसे कोई पुत्र अपनी माता को पत्नी नहीं बना सकता, वैसे ही कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को माता भी नहीं बना सकता, यही वैदिक मर्यादा है। पँचमक्कर यह सत्य नहीं जानते और मानते।
नाना प्रकार की विचित्र कथाओं व किवदंतियों से काली की पूजा एवं साधना में सिद्धि को बहुविधि प्रचारित कर गदाधर अब रामकृष्ण परमहंस जी दक्षिणेश्वर के मंदिर के प्रसिद्ध पुजारी बन बैठे। इसी जनश्रुति व ख्याति को सुनकर विद्यार्थी नरेन अपने दुःखों से मुक्ति के लिए रामकृष्ण परमहंस जी से मिले। अपने जीवनकाल में तन्त्रमार्ग के कारण इस्लाम में रूचि बढ़ने पर रामकृष्ण मुस्लिम भी बन गये थे। जीवनपर्यंत मांसाहारी थे। नतीजा बाद में गले का कैंसर हो गया। रामकृष्ण का जीवन अविश्वसनीय चमत्कारों से भरा पड़ा है जो कोई भी बुद्धिजीवी व सुविज्ञ नही माने। भक्तों द्वारा विष्णु के अवतार कहलाने वाले रामकृष्ण पूरे जीवन तन्त्रमार्ग का अनुसरण किए।
विवेकानंद का जीवन
बंगाली परिवार में 1863 ईसवी में जन्मे विवेकानंद जी का नाम नरेन या नरेन्द्र दत्त था। 21 वर्ष की युवावस्था में पिता श्री विश्वनाथ दत्त की आकस्मिक मृत्यु होने से परिवार अत्यंत गरीबी की मार झेला। बहन ने आत्महत्या कर ली। घर में अकेली माता भुवनेश्वरी देवी बची। चित्त पर इन घटनाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। कॉलेज जीवन मे दर्शनशास्त्र विषयों के गहन अध्ययन के दौरान अपने शिक्षक की प्रेरणा से दक्षिणेश्वर के पुजारी रामकृष्ण जी से मिलने की इच्छा हुई। रामकृष्ण जी उस काल में बंगाल में अपने चमत्कार के लिए प्रसिद्ध थे। रामकृष्ण परमहंस की चामत्कारिक कथाओं में एक कथा जुड़ जाती है विवेकानंद की। कहा जाता है कि विवेकानंद को माँ काली ने दर्शन दिए इत्यादि।
जितने भी अंधविश्वास फैलाने वाले बाबा, तांत्रिक, मुल्ला, मौलाना या तथाकथित पैगम्बर व धर्मगुरु होते हैं, उन्होंने हमेशा अंधविश्वास का फायदा उठाया है और इसके लिए चमत्कार मुख्य हथियार है। बिना चमत्कार दिखाएं समाज में अंधविश्वास को फैलाना और लोगों पर अपने प्रभाव को कायम करना संभव नहीं है।
इसी रास्ते को रामकृष्ण ने भी अपनाया और स्वामी विवेकानंद के बारे में भी कुछ इस तरह का दुष्प्रचार किया गया कि रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद को काली का दर्शन हुआ है ताकि लोगों के मन में विवेकानंद के प्रति गहरी श्रद्धाभक्ति भाव जगे। ईश्वर काली शिव या जो भी नाम ले परमात्मा इंद्रिय से अतीत पराशक्ति है और यह इंद्रिय या नेत्र का विषय नहीं है, यही शास्त्रोक्त वचन है। फिर भला कोई कैसे काली या परमात्मा का दर्शन कर सकता है? परमात्मा नेत्र का विषय ही नहीं है। तो यह लोगों को अंधविश्वास और सच्चे धर्म से भटकाने के सिवा और कुछ नहीं है।
विवेकानंद का कार्य
विवेकानंद की प्रसिद्धि अमेरिका में शिकागो धर्म सम्मेलन में दिए भाषण के पश्चात हुई। अमेरिकी मीडिया ने रातोंरात विवेकानंद को भारत मे लोकप्रिय बना दिया। विवेकानंद ने कट्टरता के विरुद्ध बिगुल बजाया। ईसाईयत के पक्ष में बोले। इस्लाम के भी पक्ष में बोले। विरोध किसी का नहीं। धर्म सम्मेलन में ईसाइयों ने वेद की निंदा की परन्तु विवेकानंद मूकदर्शक रहे क्योंकि उनके अनुसार वेद परमेश्वर प्रदत्त न होकर ऋषियों द्वारा इक्क्ठा अनुभवाश्रित ज्ञान है।
पाश्चात्य दार्शनिकों के विचारों से विद्यार्थी जीवन में प्रभावित होने एवं अङ्ग्रेजी शिक्षा के कारण वेद के प्रति अज्ञानतापूर्ण विचार ही प्रकट किए। इसके विपरीत ईसा और मोहम्मद की तारीफ में कोई कमी नहीं की। वस्त्र, भाषा, भोजन आदि में स्वामीजी तो पाश्चात्य संस्कृति के सन्निकट थें। वेद के प्रति उनका दृष्टिकोण पश्चिम के विचारकों के समर्थन में था।
प्रसिद्धि उपरांत अपने जीवन काल मे वेदांत के प्रचार को लक्ष्य बनाकर अमेरिका व इंग्लैंड में लेक्चर्स देते रहें।
एकमात्र टीका राजयोग पर लिखे परन्तु योग का उनका कोई अनुभव न हो कर किताबों को पढ़कर उसका अनुवाद समझना उचित होगा।
राजयोग के व्यावहारिक व्यक्तिगत अनुभव के अभाव में व तांत्रिक गुरु के प्रभाव एवं विदेशी वातावरण में मांस मछली व सिगरेट का कभी त्याग नहीं किए, यद्यपि राजयोग का आधार अहिंसा ही है। उल्टे इस बात के बचाव में कई तर्क गढ़ दिए।
रोग और देहांत
स्वामीजी प्रसिद्धि उपरांत विदेशों में घूमघूम कर वेदान्त का प्रचार करने हेतु लेक्चर्स देते रहें। मृत्यु से 2 वर्ष पूर्व 1900 में स्वदेश आ गये क्योंकि स्वास्थ्य का निरन्तर ह्रास हो रहा था। फिर भी मछली मांस बहुत चाव और असंयम से खाते थे। तामसी आमिष भोजन व धुम्रपान की लत के कारण विवेकानंद अनेकों रोगों के शिकार हो गये। भोजन व जीवन मे संयम के अभाव में मधुमेह के रोगी हो गये और 39 वर्ष की अल्प आयु में देहांत को प्राप्त हुए।
मृत्यु पूर्व स्वामीजी किडनी, लिवर, हृदय समस्या, मधुमेह, माइग्रेन, टॉन्सिलटिस, अस्थमा, गॉल्सटोन जैसी बड़ी गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त थे। मठकर्मियों के अनुसार उन्होंने महासमाधि ली थी परन्तु चिकित्सकीय निष्कर्ष के अनुसार उनकी मृत्यु ब्रेन हेमरेज अर्थात दिमाग की नसें फटने के कारण हुई। कुछ अन्य ने सामान्य मृत्यु माना।
रामकृष्ण मिशन
विवेकानंद का उद्देश्य वेदांत पर आधारित समाज की स्थापना करना था। इसके लिए वे आजीवन प्रयास करते रहें। रामकृष्ण मिशन की स्थापना वेदान्त के प्रचार और उसपर आधारित समाज की स्थापना के उद्देश्य से किया गया। मिशन में मुस्लिम एवं ईसाई मत को समान स्थान दिया गया। वर्तमान में रामकृष्ण मिशन के योगदान को निम्न विन्दुओं के आलोक में समझ सकते हैं-
रामक्रिश्निज्म मत
स्वामी विवेकानंद के द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने 1980 के दशक में कलकत्ता हाई कोर्ट मे हिन्दू न होने का शपथ पत्र दिया। शपथ पत्र में कहा गया कि रामकृष्ण मिशन हिन्दुधर्म से पृथक धर्म है। इंडिया टुडे के एक पुराने लेख के अंश को पढ़े, एफिडेविट में निम्न उद्गार हैं-
"the religion of Sri Ramkrishna is the religion separate and different from that of the Hindus...Ramkrishnaism has its separate god, separate name, separate church, separate worship, separate community, separate organisation and above all, a separate philosophy."
The Calcutta High Court has already upheld the mission's claims but whether the Ramkrishnaites will ultimately get favoured status depends on the Supreme Court where the issue will come up for hearing this fortnight.(3)
पन्द्रह वर्षों के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने रामकृष्ण मिशन के इस पृथकतावादी मत को नकार दिया हैं। इस सम्बन्ध में यह लिंक पढ़ें
After nearly 15 years, the curious case of the Ramakrishna Mission's seeking minority religious status under the Constitution of India has finally come to a close. On July 2nd, 1995, the Supreme Court of India declared that neither Sri Ramakrishna nor Swami Vivekananda founded any independent, non-Hindu religion .(4)
मिशन वस्तुतः ईसाईयत या क्रिप्टोक्रिश्चियनिटी को बढ़ावा दे रही है। सन 2015 मे नरेन्द्र मोदी जब वेलुर रामकृष्ण मठ गए तो उन्हें उपहार मे वेद या गीता नहीं बल्कि ईसाई मत की बाइबिल दी गई। इस सम्बन्ध में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे लेख देखें
Accompanied by West Bengal Governor K.N. Tripathi, the prime minister ...(5)
सन 2016 में रामकृष्ण मिशन द्वारा क्रिसमस डे मनाया गया। यह सूचना रामकृष्ण मिशन के वेलूर मठ के आधिकारिक वेबसाइट से प्राप्य है।(6)
निष्कर्ष- स्पष्ट है कि यह रामकृष्ण मिशन केवल नाम मात्र ही राम और कृष्ण की आराधना करता है। वस्तुतः यह ईसाई मिशनरियों की यह एक सहायक संस्था बन गयी है। इसका मूल कारण विवेकानंद के ईसाई मत के प्रति उनके उद्गार हैं। मिशन वास्तव मे अपने संस्थापक के दिखाए पथ पर अग्रसर है।
विवेकानन्द एव आरएसएस
विवेकानंद के अनुसार ईसा और मोहम्मद साहब ईश्वर के अवतार थे। यह विचार बंगाल व् भारत भर में सेकुलरिज्म की नींव मजबूत करने में सहायक है। इसी विचार से प्रेरित हो कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने विवेकानंद को प्रत्येक क्रियाकलापों में प्रोजेक्ट किया है। आशा है कि विवेकानंद के कारण भारत में "इसलामी शरीर और वेदांती आत्मा" पर आधारित हिंदुत्व को एक नई दिशा मिलेगी। विवेकानंद के शब्दों में —
Jesus Christ was God — the Personal God become man. He has manifested Himself many times in different forms and these alone are what you can worship. God in His absolute nature is not to be worshipped. Worshipping such God would be nonsense. We have to worship Jesus Christ, the human manifestation, as God. You cannot worship anything higher than the manifestation of God. The sooner you give up the worship of God separate from Christ, the better for you.”In the famous lecture Christ, the Messenger (delivered at Los Angeles, California in 1900)(7)
विवेकानंद का मानना था कि हजरत मोहम्मद एक महान पुरुष थे। हजरत मोहम्मद के बहुविवाह के बारे में उनके अनोखे तर्क है। उनका मानना था कि महान पुरुषों द्वारा बहुत सारे विवाह करने को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
Mohammed married quite a number of wives afterwards. Great men may marry two hundred wives each. "Giants" like you, I would not allow to marry one wife. The characters of the great souls are mysterious, their methods past our finding out. We must not judge them. Christ may judge Mohammed. Who are you and I? Little babies. What do we understand of these great souls? ...(8)
गूगल अनुवाद इस प्रकार है
मोहम्मद ने बाद में काफी पत्नियों से शादी की। महापुरुष दो सौ पत्नियों से विवाह कर सकते हैं। आप की तरह "दिग्गज", मैं एक पत्नी से शादी करने की अनुमति नहीं देता। महान आत्माओं के चरित्र रहस्यमय हैं, उनकी विधियाँ हमारे पता लगाने के अतीत हैं। हमें उनका न्याय नहीं करना चाहिए। मसीह मोहम्मद का न्याय कर सकता है। आप और मैं कौन हैं? छोटे बच्चे। हम इन महान आत्माओं को क्या समझते हैं
इस्लामी शरीर एवं वेदांती आत्मा के लिए प्रयासरत स्वामीजी को इसकी प्रेरणा अपने गुरु रामकृष्ण से मिली जो कुछ समय के लिए इस्लाम भी ग्रहण किये थे
Vivekananda&’s respect for Islam was not only instilled in him by his family, which had a strong Islamic influence, but also by his Master, Lord Ramakrishna, who played a vitally important role in shaping Vivekananda&’s secular ideas.
Vivekananda believed that the teachings of Vedanta would be unproductive without the application of Islam&’s “practical” sense of brotherhood and unity: “I am firmly persuaded that without the help of practical Islam, theories of Vedantism, however fine and wonderful they may be, are entirely valueless to the vast mass of mankind.”(9)
इस्लामी शरीर और वेदांती आत्मा के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु मठ से अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।
विवेकानन्द, गौवध और आर्यसमाज
जिस काल खंड में रामकृष्ण परमहंस बंगाल में ब्रह्म समाज की स्थापना में सहयोग दिए। उसी समय आर्यसमाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 ईसवी में बम्बई में की। ब्रह्मसमाज विदेशी विचारों एवं रहन सहन से प्रभावित था। उसी प्रभाव में स्वामी विवेकानंद पश्चिम की ओर आशा लगाये परदेशगमन किए थे। विदेशी चकाचौंध में गौवध पर भी उनको आपत्ति नहीं रही। एक बार गौकशी के विरोध के लिए निवेदन करने गए कुछ कार्यकर्ताओं को उल्टा ही उपदेश देने लगे। इस संबंध में बीबीसी लिखता है -
फिर विवेकानंद कर्म फल के तर्क पर आते हैं. वे कहते हैं, "अपनों कर्मों के फल की वजह से मनुष्य मर रहे हैं- इस तरह कर्म की दुहाई देने से जगत में किसी काम के लिए कोशिश करना तो बिल्कुल बेकार साबित हो जाएगा. पशु-पक्षियों के लिए आपका काम भी तो इसके अंतर्गत आएगा. इस काम के बारे में भी तो बोला जा सकता है- गोमाताएँ अपने-अपने कर्मफल की वजह से ही कसाइयों के हाथ में पहुँच जाती हैं और मारी जाती हैं इसलिए उनकी रक्षा के लिए कोशिश करना भी बेकार है."इस लिंक पर क्लिक कर पूरा प्रसंग पढ़े ।
विवेकानंद का पशुबलि में विश्वास
रही सही कमी स्वामी जी के पशुबलि में विश्वास से पूरी हो जाती है। विवेकानंद का मानना था कि पशुबलि से देवी देवता प्रसन्न होते हैं। ऐसा सोचकर उन्होंने काली माँ की पूजा में बकरे की बलि दी। इस सम्बंध में बेलूर मठ हावड़ा से उन्होंने 12 नवम्बर1901 में सिस्टर क्रिस्टीन को पत्र लिखते हुए कहा है—
Thousands of people were entertained, but I could not see the Puja, alas! I was down with high fever all the time. Day before yesterday, however, came the Puja of Kali. We had an image, too, and sacrificed a goat and burned a lot of fireworks.
हिंदी अनुवाद
हजारों लोगों का मनोरंजन किया गया, लेकिन मैं पूजा नहीं देख सका, अफसोस! मैं हर समय तेज बुखार के साथ नीचे था। हालांकि, कल से एक दिन पहले, काली की पूजा हुई। हमारे पास एक छवि भी थी, और एक बकरी की बलि दी और बहुत सारी आतिशबाजी जला दी।
इसमें कोई शक नहीं की विवेकानन्द एक सच्चे हिन्दू थे परन्तु हिन्दुओं के धर्मांतरण पर भी कुछ नहीं कर पाये। इसका मूल कारण ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या की सोच सहायक रही। संसार में हिंदुओं का मतांतरण उनके लिए गौण विषय था। एक सच्चे हिन्दू की तरह जातपात भी उनके लिए ईश्वर या ब्रह्म की माया था। अत हिन्दुओं के दुखों से व्यथित रहने के बावजूद सबकुछ माया है मानकर स्वीकार करते गये।
आर्यसमाज और रामकृष्ण मिशन या ब्रह्म समाज के दर्शन चिंतन में गहरा मतभेद है। विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों में अंतर स्पष्ट करने के लिए भवानी लाल भारतीय ने पुस्तक लिखी है जिसे पढ़कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
© अजीत कुमार, सर्वाधिकार सुरक्षित।
फुटनोट
- [1] सप्तम समुल्लास - Satyarth Prakash (Hindi)
- [2] Swami Vivekananda
- [3] Ramkrishna Mission's non-Hindu claim causes dismay among many of its followers
- [4] Hinduism Today Magazine
- [5] Modi visits Dakshineswar temple, Belur Math | India News - Times of India
- [6] Christmas Eve 2016 : Photos
- [7] Swami Vivekananda's Quotes On Jesus Christ - VivekaVani
- [8] The Complete Works of Swami Vivekananda/Volume 1/Lectures And Discourses/Mohammed
- [9] Vivekananda was an admirer of Islam - The Statesman
महाशय आपने जो यह महाभ्रामक व झूठी जानकारी डाली हुई है और इसके तुष्टिकरण में जो नकली link दिये हैं कृपया उन्हे मेरे email पर भेजने की कृपा करें ताकी उन link पर जाकर मुझे भी पता चल सके की आपके अलावा और कौन कौन एसि मूढ मति वाला पशुमानव अब तक धरती पर जिन्दा है। आपके लेख में जरा भी सत्यता होती तो लिंक सारे काम करते लेकिन अफसोस एक भी link काम नही कर रहा विल्कुल आपके इस लेख की तरह घटिया व जालसाज link है लेकिन फिर भी अगर कहीं एसे link अस्तीत्व में हो तो मुझे भेजें।मेरी id है- kaustubhgautam21@gmail.com जय विवेकानंद।
जवाब देंहटाएंश्रीमान सारे लिंक अद्यतन कर दिया हूँ। कृपया लिंक पर क्लिक कर तथ्यों का सत्यापन कर लीजिए। ब्लॉग पर सक्रिय नहीं होने के कारण उत्तर देने में देर हुई। ब्लॉग पर प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद।
हटाएंhttps://youtu.be/wF4UYQresZQ
जवाब देंहटाएंब्लॉग पर सदैव सक्रिय नहीं रहने के कारण देर से जवाब दे रहा हूँ। लिंक अद्यतन कर दिया हूँ। आशा है कि लिंक क्लिक कर तथ्यों का सत्यापन कर लेंगे।
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