मील का पत्थर
वह मील का पत्थर है
पत्थर का खुदा नहीं
वह राह दिखाता सबको
कोई फूल चढाता नहीं
वह राह की पहचान है
मन्जिल की वह जान है
कितना चल लिए और कितना चलना है
इसका पैमाना है वह
धूल से सना है घास से लिपटा है
न रूप मिला है इसको
न ठौर किसी मंदिर का
आकाश के नीचे
रोड के नीचे पड़ा है
कोई फूल चढाता नहीं
धूल से धरसित
वह राह दिखाता सबको
पर उसका मान सम्मान नहीं।
(अतीत के झरोखों से)
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