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बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

इस्लामी साम्राज्यवाद और हिन्दू

संलग्न चित्र मोहम्मद इब्न जकारिया अल राजी, चिकित्सक

तालिबान प्रकरण से दुनिया सीख ले या न ले लेकिन हिंदुओं को अवश्य सबक लेना चाहिए। इस्लाम वैश्विक साम्राज्यवाद का नाम है जिसको धर्म का जामा पहनाकर अच्छा बताया जाता है। सातवीं शताब्दी से लेकर १५ वीं शताब्दी तक का इस्लाम का विस्तारवादी कालखंड पूरी दुनिया में मारकाट और मानवता की हत्या के सिवा और कुछ नहीं रहा है। हां, ऐसे वामपंथी पत्रकार और इतिहासकार है जो इस कालखंड को विज्ञान की प्रगति और विकास का काल घोषित करने की भी कोशिश करते हैं। लेकिन सच को झूठलाया नहीं जा सकता। इस्लाम जहां भी गया, उसने वहां की सभ्यता को नष्ट किया। वहां के लोगों की सोच, स्वतंत्र विचार को कुंठित करने के लिए वहां के बुद्धिजीवियों की हत्या की, पुस्तकालय को जलाया गया, जबरदस्ती लोगों का मतान्तरण किया गया।

भारत के घाव के सम्बंध में इस्लामी साम्राज्यवाद का गहरा संबंध रहा है। भारत आज भी इस घाव से रक्त रिस रहा है। कश्मीर, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश उसी घाव की निशानी हैं।

आज यह बताया जाता है कि गरीब दलित पिछड़े लोगों ने खुशी-खुशी इस्लाम को स्वीकार किया जबकि वस्तुस्थिति इसके विपरीत थी। गरीब जजिया नहीं दे सकते थे, डर और भय का माहौल था, वे अपनी रक्षा में स्वयं असमर्थ थे और शासक व धर्मगुरू वेदविहित कर्मो का त्याग कर बहुत पहले ही अनीश्वरवादी और भोगवादी बन गए थे। जैन, बौद्ध जैसे अनीश्वरवादी और पौराणिक मतावलंबियों मे प्रतिस्पर्धा और वैमनस्य था। ईश्वरवादी पौराणिक कथाओं मान्यताओं और अंधविश्वास में जकड़े हुए थे। अतः कर्तव्यपरायणता और स्वदेश भक्ति न्यून होती गई। ऐसे हालात में समाज का एक वर्ग असुरक्षा और भय के माहौल में मतांतरित हुआ। जिसे पुनः हिन्दू समाज मे वापस भी नहीं लिया गया। साथ ही, मतान्तर के लिए सूफ़ीवाद का सहारा लिया गया। छल और बल दोनों का एक साथ प्रयोग इस्लाम की नीति रही है।

आज भी इस्लाम इसी दोहरे चरित्र और मुखौटे में है। इससे इस्लाम सुरक्षित भी महसूस करता है और सफल भी। वर्तमान विश्व में जो हालात हैं, इसमें स्पष्ट है कि वामपंथी मीडिया और शिक्षा व्यवस्था में बैठे माफिया विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में इस्लामी विचार को पोषित करते हैं और इतिहास के सच का गला घोंटने का प्रयास करते हैं। आतंकवाद को चीनी की चाशनी में डुबोकर शांतिपूर्ण इस्लाम के चैप्टर पढ़ाए जाते हैं जिसको benign Islam कहा जाता है। 

जिस तरह कॉम्युनिस्ट रक्तपात पूर्ण सत्ता परिवर्तन में विश्वास करते है इस्लामिस्ट उससे लेशमात्र भी इतर नहीं हैं। बस अंतर यह है कि इस्लाम मज़हब का सहारा लेकर चरित्रहनन करता है जबकि कम्युनिस्ट मनुष्य को ईश्वरविहीन कर।

मोहम्मद और इस्लामी साम्राज्यवाद के सम्बंध में अनवर शेख के लेख/पुस्तकें प्रत्येक भारतवासी के लिए पठनीय हैं।

अनवर शेख का जन्म गुजरात में हुआ था। बाद में ये पाकिस्तान चले गए। हिन्दू सिक्खों के कत्ल भी अनवर ने किया परन्तु बाद में इस्लाम से इनका मोहभंग हो गया। उनको ईशनिंदा के अपराध में जान से मारने का भी प्रयास किया गया। गूगल कर उनकी जीवनी पढ़े।

© अजीत कुमार, सर्वाधिकार सुरक्षित।

अनवर शेख की प्रसिद्ध पुस्तकों की पीडीएफ
  • इस्लाम : अरब सम्राज्यवाद
  • जिहाद के प्रलोभन : सेक्स और लूट
  • इस्लाम : कामवासना और हिंसा
  • इस्लाम : अरब राष्ट्रीयता का साधन
अंग्रेजी पुस्तकें :
  • Why Muslims destroy Hindu temples
  • Islam : The Arab Imperialism 
Anwar Sheikh website articles

क्या फलित ज्योतिष पर विश्वास करना चाहिए

मनुष्य का अपने भविष्य को जानने के प्रति जिज्ञासा होती है और इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए फलित ज्योतिष का विकास हुआ। अब मनुष्य में इच्छाओं की कोई कमी नहीं। इच्छाओं की पूर्ति के नाम पर पशुबलि और छद्मग्रन्थों की रचना भी हुई।

फलित ज्योतिष की सत्यता को समझने के लिए मैंने कीरो और नारायण दत्त श्रीमाली की पुस्तक इत्यादि का अध्ययन भी किया। इसके अतिरिक्त न्यूमैरोलॉजी और टैरो कार्ड को भी समझने की कोशिश किया और पाया की इन ग्रंथों में कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है अपितु अनेक तरह से भ्रमित करने वाले शब्दों के प्रयोग द्वारा आम मनुष्य को भ्रम में डाला जाता है। मैंने कई सारे लोगों के साथ इसका परीक्षण भी किया। अधिकांश परिस्थितियों में मैंने पाया कि मनोवैज्ञानिक कारणों से भविष्यफल जानने के लिए व्यक्ति उत्सुक होता है और कई सारे लोग तो मेरी भविष्यवाणी से बहुत प्रभावित भी हुए। अब सच क्या है, यह मेरे लिए स्पष्ट था।

हस्तरेखा और भविष्यवाणी का सच या झूठ होना पूरी तरह मनोविज्ञान पर आधारित है। कोई भी हस्तरेखा विशेषज्ञ और फलादेश करने वाला अपना भविष्य तो बता नहीं सकता लेकिन दूसरे का भविष्य ऐसे बताता है मानो स्वच्छ दर्पण में अपना चेहरा देख रहा हो। फलित ज्योतिष का कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है। अगर कोई शब्दो को गूंथना जानता है तो वह एक सफल फलितज्योतिषी बन सकता है।

ऐसा सभी विद्वानों का मानना है और जिन खगोल शास्त्रियों का नाम फलित ज्योतिष में लिया जाता है, खगोल विद्या के लिए प्रसिद्ध है ना की फलित ज्योतिष के लिए। उदाहरण के लिए वराह मिहिर आर्यभट्ट इत्यादि।

और जो यह कहते फिरते हैं कि सभी चीजों का एक दूसरे पर प्रभाव होता है तो उनसे प्रश्न है कि क्यों किसी घटना की व्याख्या के लिए संसार की सभी चीजों को जिम्मेदार नहीं जाता है। अब कोई किसी को चाकू मार दे तो चाकू बनाने वाले को सजा देते हैं अथवा कातिल को। कार्य कारण की सत्य व्याख्या के अभाव में पढेलिखे लोग भी ज्योतिष के चक्कर में पड़ जाते हैं।

पुरुषार्थ प्रारब्ध से मुख्य है क्योंकि पुरुषार्थ से ही प्रारब्ध बनता और बिगड़ता है। इस विचारधारा के त्याग से ही मनुष्य भाग्यवादी होकर पुरुषार्थ हीन हो जाता है और फलितज्योतिषी के चक्कर में लगा रहता है।

नवम्बर २०१९

© अजीत कुमार, सर्वाधिकार सुरक्षित।

मंगलवार, 12 मई 2020

हलाल अर्थव्यवस्था - एक संक्षिप्त विवेचना

हलाल अरबी का शब्द है जिसका अर्थ है मान्य अथवा स्वीकार्य। इसके विपरीत हराम का अर्थ है अमान्य अर्थात अस्वीकार्य। आमतौर पर हलाल शब्द का प्रयोग खानपान के संबंध में प्रचलित है। उदाहरण के लिए हलाल माँस। हलाल माँस ऐसा माँस होता है जो किसी पशु का वध इस्लामिक तरीके से करके प्राप्त किया जाता है। इसके अंतर्गत उस जीव की श्वास नलिका को इस तरीके से काट दिया जाता है कि उससे खून का फव्वारा छोड़ता रहता है और पशु के शरीर से खून निकल जाता और वह प्राण त्याग देता है। साथ ही जीव को वध करते समय कुछ आयतें भी पढ़ी जाती हैं और अल्लाह का शुक्रिया अदा किया जाता है। इसके साथ और भी कई सारी बातें हैं।

हलाल अर्थव्यवस्था के संबंध में कुछ प्रमुख बातें


१) उत्पाद खर्च में वृद्धि


कोई कंपनी हलाल सर्टिफिकेट कराती है और उसके बदले में कम्पनी हलाल सर्टिफिकेशन देने वाली कंपनी को इसका भुगतान करती है। इसके फलस्वरूप क्रेता कंपनी के उत्पाद खर्च में वृद्धि हो जाती है क्योंकि हलाल सर्टिफिकेशन में आने वाले खर्चे को भी हलाल सर्टिफिकेट कराने वाली कंपनी अपने उत्पात खर्च में शामिल कर लेती है। इसके फलस्वरूप कंपनी के उत्पाद ज्यादा कीमत में बाजार में उपलब्ध होते हैं अतः बढ़ती कीमत का बोझ उपभोक्ता पर पड़ता है। हलाल सर्टिफिकेशन देने वाली कंपनी की आय में वृद्धि होती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सर्टिफिकेट देने वाली कम्पनी एक "इस्लामी" कम्पनी होती है क्योंकि इसका प्रामाणिकरण किसी मुसलमान द्वारा ही किया जा सकता है।

२) पक्षपाती बिजनेस मॉडल


हलाल सर्टिफिकेशन के द्वारा हलाल अर्थव्यवस्था का प्रचार-प्रसार हो रहा है और यह एक पक्षपाती बिजनेस मॉडल (biased business model) है जिसके द्वारा गैर इस्लामिक संस्कृति की उपभोक्ता वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तरीके से तिरस्कार किया जाता है इसके विपरीत इस्लामिक संस्कृति की उपभोक्ता वस्तुओं को बढ़ावा दिया जाता है। आधुनिक समतामूलक समाज में हलाल अर्थव्यवस्था एक वैचारिक सांस्कृतिक आक्रमण की तरह है।

३)  कम्पनी अपने उत्पाद को हलाल सर्टिफाइड क्यों कराती हैं


सवाल यह है कि कंपनियां इस तरह के हलाल सर्टिफिकेशन को क्यों खरीदते हैं। दूसरे शब्दों में कम्पनी अपने उत्पाद को हलाल सर्टिफाइड क्यों कराती हैं। इसका सीधा सा उत्तर यह है कि वर्तमान विश्व में मुसलमानों की आबादी कुल विश्व जनसंख्या का लगभग 25% है और प्रत्येक कंपनी इतनी बड़ी जनसंख्या को इग्नोर नहीं कर सकती। मुस्लिम देशों में हलाल सर्टिफाइड उत्पादों की मांग होती है और उस मांग को ध्यान में रखते हुए विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियां जैसे मैकडोनाल्ड इत्यादि इस्लामिक मुल्कों की इस मांग को ध्यान में रखते हुए अपने उत्पाद को हलाल सर्टिफाइड कराती हैं। उदाहरण के लिए मैकडोनाल्ड मांस को बेचने के समय उस पर हलाल सर्टिफाइड का चिह्न लगाता है ताकि पहचाना जा सके कि यह माँस इस्लामिक तरीके से जिबह किए गए जानवर से प्राप्त है।

४) गैर मुसलमानों को रोजगार से वंचित करना 


हलाल मांस किसी मुस्लिम व्यक्ति द्वारा इस्लामी तरीके से जिबह किए गए जीव का मांस है। इसका अर्थ यह हुआ कि हलाल माँस मुसलमानों के रोजगार को बढ़ावा देता है इसके विपरीत गैर मुसलमानों को रोजगार से वंचित करता है इस प्रकार रोजगार के प्रति भी यह पक्षपातपूर्ण है।

५) भावनाओं के प्रति पक्षपात 


कई सारे सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुएं अर्थात कॉस्मेटिक की वस्तुओं में सूअर या गाय की चर्बी इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। इस्लाम के अनुसार सूअर हराम है। इसी प्रकार अल्कोहल को भी हराम माना गया है। अतः इन उत्पादों में अल्कोहल या सूअर जैसे एनिमल प्रोटीन के होने पर उनको हलाल सर्टिफाइड नहीं कराया जा सकता ताकि मुसलमानों की भावनाएं आहत ना हो।लेकिन गाय की चर्बी जिससे हिन्दुओं की भावनाएं आहत होती हैं पर हलाल अर्थव्यवस्था मौन रहता है। भावनाओं के प्रति ऐसा पक्षपात समानता के सिद्धांत के प्रतिकूल है।

६) संस्कृति के संघर्षों में बढ़ावा


सबसे बड़ी बात यह है कि अगर प्रत्येक संस्कृति के लोग अपनी अपनी संस्कृति के अनुसार हलाल अर्थात मान्य और हराम अर्थात अमान्य को तय करें तो संस्कृति के संघर्षों में बढ़ावा होगा। उदाहरण के लिए, जैन और हिंदू संस्कृति में जीव हिंसा पाप है और जब कोई जैन या हिन्दू अपने उत्पाद को जैन और हिंदू के नाम से बेचते हैं तो उसे सामाजिक पक्षपात मानकर दंडित भी किया सकता है, परन्तु हलाल के प्रति जागरूकता की कमी अथवा अन्यान्य कारणों से समाज में इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों में कम ही चर्चा हो रही है।

७) हलाल धन का उपयोग


सबसे विचारणीय प्रश्न तो यह है कि हलाल अर्थव्यवस्था में हलाल सर्टिफिकेशन और अन्य तरीके से जो आय इकट्ठी होती है उस एकत्रित धन का उपयोग मुस्लिम समाज द्वारा किस प्रकार किया जा रहा है। यह अपने आप में एक बड़ा विषय है और इसपर अनेक पृष्ठ के लेख लिखा जा सकता है। यह पक्ष सुधि पाठको के लिए छोड़ते हैं। १२ मई २०२०

© अजीत कुमार, सर्वाधिकार सुरक्षित।

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